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Tuesday, 9 June 2026

सरकारी फाइलों से पूरा गांव गायब: जमीन बचाने के लिए तहसील कार्यालय में 'सत्याग्रह' पर बैठे दगड़खेड़ी के आदिवासी, अधिकारी नजरबंद

 सरकारी फाइलों से पूरा गांव गायब: जमीन बचाने के लिए तहसील कार्यालय में 'सत्याग्रह' पर बैठे दगड़खेड़ी के आदिवासी, अधिकारी नजरबंद



​बड़ी लापरवाही: ग्राम दगड़खेड़ी का भू-अभिलेख गुम, 250 परिवारों की पुश्तैनी जमीन को प्रशासन ने बताया 'शासकीय'।


​बड़ा आरोप: औद्योगिक क्षेत्र के नाम पर कंपनी को जमीन सौंपने की साजिश, भड़के ग्रामीणों ने घेरा भगवानपुरा तहसील कार्यालय।


​आर-पार की जंग: धरना स्थल पर ही चूल्हा-चौका शुरू, मांग पूरी होने तक हटने से साफ इनकार।


 ​भगवानपुरा//-प्रशासन की एक घोर लापरवाही के कारण मध्य प्रदेश के खरगोन जिले की भगवानपुरा के समीप  'दगड़खेड़ी' गांव ही सरकारी रिकॉर्ड से गायब हो गया है। धूलकोट पंचायत के इस आदिवासी बाहुल्य गांव के भू-अभिलेख  गुम हो जाने के बाद, अब प्रशासन ने यहां के करीब 200 से 250 आदिवासी परिवारों की पुश्तैनी जमीन को 'शासकीय' घोषित कर दिया है। इस बड़ी प्रशासनिक चूक और आदिवासियों की जमीन को एक निजी कंपनी के औद्योगिक क्षेत्र के लिए सौंपने की कथित साजिश के खिलाफ सोमवार को दगड़खेड़ी के सैकड़ों आंदोलनकारी आदिवासी महिला, पुरुष और बुजुर्गों ने मोर्चा खोल दिया।

​सोमवार दोपहर 1:00 बजे गांव से एक विशाल आक्रोश रैली निकाली गई, जो तहसील कार्यालय पहुंची। आदिवासियों ने न केवल तहसील प्रांगण के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया, बल्कि कार्यालय के मुख्य गेट को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया। इसके चलते तहसीलदार संजय चौहान, नायब तहसीलदार पूनिया परमार सहित पूरा तहसील स्टाफ कार्यालय के अंदर ही 'नजरबंद' हो गये है। रात्रि 9:00 बजे तक तहसीलदार सहित पूरा स्टाफ कार्यालय के अंदर ही नजर बंद थे आंदोलनकारी महिलाओं के गेट पर मुस्तैद हो जाने के कारण अधिकारियों का घर जाना भी दूभर हो गया।


​सरकारी गलती की सजा भुगत रहे अन्नदाता


​आंदोलन का नेतृत्व कर रहे ग्रामीणों ने तीखे सवाल उठाते हुए पूछा कि "जब गलती शासन और प्रशासन की है, तो उसकी सजा आदिवासी किसान क्यों भुगतें?"

​ग्रामीणों के पास दशकों पुरानी पुश्तैनी पावती और अन्य वैध दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन सरकारी कंप्यूटरों और फाइलों में उनकी जमीन का कोई नामोनिशान नहीं है। जिन गिने-चुने किसानों के रिकॉर्ड मिल भी रहे हैं, वे गलत स्थानों पर दर्ज हैं। रिकॉर्ड गायब होने की वजह से ये गरीब आदिवासी किसान पिछले कई वर्षों से ​प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि,​सहकारी समितियों से ऋण, ​खाद, बीज और फसल बीमा,​सिंचाई योजनाओं और विद्युत अनुदान ,जैसी तमाम महत्वपूर्ण सरकारी और कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से पूरी तरह वंचित हैं।


​कंपनी को जमीन देने की साजिश का डर


​ग्रामीणों के मुताबिक, हाल ही में उन्हें पता चला कि प्रशासन इस पूरे क्षेत्र को 'शासकीय' बताकर यहां औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की योजना बना रहा है। आदिवासियों को डर है कि बिना रिकॉर्ड के उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल कर दिया जाएगा। हालांकि, ग्राम सभा ने इस प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र को निरस्त करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया है, लेकिन जब तक रिकॉर्ड में सुधार नहीं होता, आदिवासियों पर विस्थापन की तलवार लटकती रहेगी।

​"यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं है, यह हमारे अस्तित्व, सम्मान और जल-जंगल-जमीन के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई है।"

— आंदोलनकारी ग्रामीण

​सालों से मिल रहे सिर्फ खोखले आश्वासन

​यह विवाद नया नहीं है। ग्रामीण वर्ष 2022 से लगातार मुख्यमंत्री, कलेक्टर, एसडीएम और स्थानीय प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं। हद तो तब हो गई जब 07 सितंबर 2024 को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष श्री अंतर सिंह आर्य ने स्वयं जिला प्रशासन को इस मामले में त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए थे, लेकिन दो साल बाद भी नतीजा 'शून्य' रहा।

​ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन अपनी गलती सुधारने के बजाय मामले को उलझा रहा है। अधिकारियों द्वारा राजस्व भूमि को पहले वन भूमि घोषित करने और फिर उसे दोबारा राजस्व भूमि में बदलने जैसे अव्यावहारिक सुझाव दिए जा रहे हैं, जिसे ग्रामीण मूल समस्या को टालने का प्रयास मान रहे हैं।

​तहसील परिसर में ही डाल दिया डेरा

​आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके आदिवासियों ने तहसील परिसर को ही अपना अस्थायी आशियाना बना लिया है। ग्रामीणों ने ट्रैक्टर-ट्रॉली में राशन, बर्तन और बिस्तर लाकर धरना स्थल पर ही चूल्हा-चौका शुरू कर दिया है। सोमवार की रात ग्रामीणों ने तहसील परिसर में ही खुले आसमान के नीचे गुजारी।

​आंदोलनकारियों ने तहसीलदार के माध्यम से मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव (आदिवासी कार्य विभाग), प्रमुख सचिव (राजस्व विभाग) और जिला कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा है। आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से सुभाष निगोले, नाहरसिंग पटेल, मदन बामने, शोभाराम खोडे, नाहरसिंग सस्ते, कैलाश जमरे, शिवराम कनासे सहित कई वरिष्ठ ग्रामीणों द्वारा किया जा रहा है। आदिवासियों का साफ कहना है कि जब तक प्रशासन लिखित में उनकी मांगों को स्वीकार नहीं करता और ग्राम सभा की निगरानी में दोबारा री-सर्वे का आदेश जारी नहीं होता, तब तक आंदोलन और अधिकारियों का घेराव जारी रहेगा।

दगड़खेड़ी के ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री प्रमुख सचिव (आदिवासी कार्य विभाग) राजस्व विभाग और जिला कलेक्टर के नाम आज ज्ञापन दिया, जिसे हमने उच्च अधिकारियों तक भेज भी दिया है। ज्ञापन के बाद आंदोलनकारी धरने पर बैठ गए हैं वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश के बाद ही आगे की स्थिति बता सकते है।

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