धरमपुरी में आस्था का सैलाब: 819 वर्ष पुराने रजत मुकुट के साथ निकली भगवान श्री बिल्वामृतेश्वर महादेव की राजसी शाही सवारी
धरमपुरी// नगर में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी भगवान श्री बिल्वामृतेश्वर महादेव की भव्य राजसी शाही सवारी धूमधाम और भक्तिभाव के साथ निकाली गई। महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व निकलने वाली इस ऐतिहासिक परंपरा में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। भोले की बारात में जनसैलाब उमड़ पड़ा और पूरा नगर ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से गूंज उठा।
दोपहर बाद स्थानीय तहसील परिसर स्थित श्री ऋणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर से शाही सवारी प्रारंभ हुई। फूलों से सुसज्जित रथ पर भगवान श्री बिल्वामृतेश्वर महादेव के 819 वर्ष पुराने रजत मुकुट को विराजमान किया गया। सर्वप्रथम पं. बबलूभाई व्यास एवं पं. महेन्द्र जोशी ने विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर महाआरती की, जिसके बाद शाही सवारी नगर भ्रमण पर निकली।
✨ मार्ग पर उमड़ा जनसैलाब
बस स्टैंड, बावड़ी चौराहा, रैदास मोहल्ला, सराफा बाजार होते हुए सवारी राजबाड़ा चौक पहुंची, जहां भव्य महाआरती सम्पन्न हुई। इसके पश्चात रजत मुकुट को बेंट स्थित श्री बिल्वामृतेश्वर महादेव मंदिर ले जाया गया, जहां शाही सवारी का समापन हुआ।
पूरे मार्ग पर मकानों की छतों और ओटलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। गरबा एवं आदिवासी लोकनृत्य दलों ने भक्ति का रंग जमाया। डीजे, ढोल-बैंड और भूतों की टोली आकर्षण का केंद्र रही। फूल बरसाती तोपों से श्रद्धालुओं पर पुष्पवर्षा की गई। जगह-जगह आकर्षक रंगोली सजाई गई तथा समाजसेवियों, प्रेस क्लब और सनातन किन्नर समाज द्वारा शिवभक्तों के लिए पेयजल और फलाहार की व्यवस्था की गई।
🛡️ सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
एडीशनल एसपी विजय डावर, एसडीओपी बृजेश मालवीय एवं थाना प्रभारी संतोष कुमार यादव सहित प्रशासनिक अधिकारी पुलिस बल के साथ पैदल नगर भ्रमण करते रहे और सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करते रहे। तहसील परिसर में एसडीएम एवं ब्लॉक अध्यक्ष प्रशांत शर्मा द्वारा महाआरती की गई। पुलिस जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर सलामी दी।
📜 819 वर्ष पुराना रजत मुखौटा बना आस्था का केंद्र
भगवान बिल्वामृतेश्वर महादेव का चांदी का मुखौटा विक्रम संवत की 12वीं शताब्दी में निर्मित बताया जाता है। इस पर फसली सन 1286 अंकित है। मुखौटे का वजन 1662.5 तोला (लगभग 19 किलो 391 ग्राम) है। उस समय इसकी कीमत 2413 रुपये दर्ज की गई थी। देश में इस प्रकार की अद्वितीय कलाकृति अन्यत्र नहीं पाई जाती। महाशिवरात्रि के पूर्व इसे शाही सवारी के रूप में बेंट संस्थान ले जाने की वर्षों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है।


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